मदर टेरेसा जीवन परिचय (Mother Teresa Biography in Hindi)

दया की देवी, दीन हीनों की माँ तथा मानवता की मूर्ति मदर टेरेसा एक ऐसी सन्त महिला थीं जिनके माध्यम से हम ईश्वरीय प्रकाश को देख सकते थे । उन्होंने अपना जीवन तिरस्कृत, असहाय, पीड़ित, निर्धन तथा कमजोर लोगों की सेवा में बिता दिया था ।


मदर टेरसा
जन्म26 अगस्त 1910
उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य (आज का सोप्जे,मेसेडोनिया गणराज्य)
मृत्यु5 सितम्बर 1997 (उम्र 87)
कोलकाताभारत
राष्ट्रीयताअल्बीनियाई
व्यवसायरोमन केथोलिक नन, मानवतावादी



वह संगठन जो उन्होंने अब से तीस वर्ष पहले अपने सहयोगी भाई बहनों की सहायता से गरीबों की भलाई के लिए नि: शुल्क शुरू किया था आज एक विश्वव्यापी संगठन बन चुका है । नोबल प्राइज फाउन्डेशन ने 1979 में मदर टेरेसा को विश्व के सर्वोच्च पुरस्कार नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत किया था । यह पुरस्कार शान्ति के लिए उनकी प्रवीणता के लिए दिया गया था ।

मदर टेरेसा (२६ अगस्त १९१० - ५ सितम्बर १९९७) का जन्म अग्नेसे गोंकशे बोजशियु के नाम से एक अल्बेनीयाई परिवार में उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य (आज का सोप्जे, मेसेडोनिया गणराज्य) में हुआ था। मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं, जिनके पास भारतीय नागरिकता थी। उन्होंने १९५० में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी की स्थापना की। ४५ सालों तक गरीब, बीमार, अनाथ और मरते हुए इन्होंने लोगों की मदद की और साथ ही चेरिटी के मिशनरीज के प्रसार का भी मार्ग प्रशस्त किया।
१९७० तक वे ग़रीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्द हो गयीं, माल्कोम मुगेरिज के कई वृत्तचित्र और पुस्तक जैसे समथिंग ब्यूटीफुल फॉर गोड में इसका उल्लेख किया गया। उन्होंने १९७९ में नोबेल शांति पुरस्कार और १९८० में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा के जीवनकाल में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी का कार्य लगातार विस्तृत होता रहा और उनकी मृत्यु के समय तक यह १२३ देशों में ६१० मिशन नियंत्रित कर रही थी। इसमें एचआईवी/एड्स, कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/ घर शामिल थे और साथ ही सूप रसोई, बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम, अनाथालय और विद्यालय भी थे। मदर टेरसा की मृत्यु के बाद उन्हें पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया और उन्हें कोलकाता की धन्य की उपाधि प्रदान की।

आजीवन सेवा का संकल्प

१९८१ ई में आगवेश ने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया और उन्होने आजीवन सेवा का संकल्प अपना लिया। उन्होने स्वयं लिखा है - वह १० सितम्बर १९४० का दिन था जब मैं अपने वार्शिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। उसी समय मेरी अन्तरात्मा से आवाज़ उठी थी कि "मुझे सब कुछ त्याग कर देना चाहिए और अपना जीवन इश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा कर के क्ंगाल तन को समर्पित कर देना चाहिए।"

समभाव से पीडित की सेवा

मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं है। उन्होनें सद्भाव बढाने के लिए संसार का दौरा किया है। उनकी मान्यता है कि 'प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बडी है।' उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वय्ं-सेवक भारत आये तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना है कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें - भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें, अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।

विविध पुरुस्कार एवम सम्मान

मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिये विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित किय गया है।
* रामन मैगसेस पुरस्कार (1962)
* पोप जॉन XXIII शांति पुरस्कार (1971)
* जवाहरलाल नेहरू अवार्ड फॉर इंटरनॅशनल पीस (1972)
* नोबेल शांति पुरस्कार (1979)
* भारत रत्न (1980)
* ऑर्डर ऑफ़ मैरिट (1983)
* राजीव गांधी सदभावना पुरस्कार (1993)

मृत्यु

हार्ट अटैक के कारण 5 सितंबर 1997 के दिन मदर टैरेसा की मृत्यु हुई थी।


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