"विद्रोही" प्रेमचंद कहानी ~ Mansarovar Story Part-2

Vidrohi stories mansarovar part 2 Hindi

ज दस साल से जब्त कर रहा हूँ। अपने इस नन्हे-से ह्रदय में अग्नि का दहकता हुआ कुण्ड छिपाये बैठा हूँ। संसार में कहीं शान्ति होगीकहीं सैर-तमाशे होंगेकहीं मनोरंजन की वस्तुएँ होंगीमेरे लिए तो अब यही अग्निराशि है और कुछ नहीं। जीवन की सारी अभिलाषाएँ इसी में जलकर राख हो गयीं। किससे अपनी मनोव्यथा कहूँ फायदा ही क्या जिसके भाग्य में रुदनअनंत रुदन होउसका मर जाना ही अच्छा।

मैंने पहली बार तारा को उस वक्त देखाजब मेरी उम्र दस साल की थी। मेरे पिता आगरे के एक अच्छे डाक्टर थे। लखनऊ में मेरे एक चचा रहते थे। उन्होंने वकालत में काफी धन कमाया था। मैं उन दिनों चचा ही
के साथ रहता था। चचा के कोई सन्तान न थीइसलिए मैं ही उनका वारिस था। चचा और चची दोनों मुझे अपना पुत्र समझते थे। मेरी माता बचपन ही में सिधार चुकी थीं। मातृ-स्नेह का जो कुछ प्रसाद मुझे मिलावह चचीजी ही की भिक्षा थी। वही भिक्षा मेरे उस मातृ-प्रेम से वंचित बालपन की सारी विभूति थी।

चचा साहब के पड़ोस में हमारी बिरादरी के एक बाबू साहब और रहते थे। वह रेलवे-विभाग में किसी अच्छे ओहदे पर थे। दो-ढाई सौ रुपये पाते थे। नाम था विमलचन्द्र। तारा उन्हीं की पुत्री थी। उस वक्त उसकी उम्र
पाँच साल की होगी। बचपन का वह दिन आज भी आँखों के सामने हैजब तारा एक फ्रॉक पहनेबालों में एक गुलाब का फूल गूंथे हुए मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। कह नहीं सकताक्यों मैं उसे देखकर झेंप-सा गया। मुझे वह देव-कन्या सी मालूम हुईजो उषा-काल के सौरभ और प्रकाश से रंजित आकाश से उतर आयी हो।

उस दिन से तारा अक्सर मेरे घर आती। उसके घर में खेलने की जगह न थी। चचा साहब के घर के सामने लम्बा-चौड़ा मैदान था। वहीं वह खेला करती। धीरे-धीरे मैं भी उससे मानूस हो गया। मैं जब स्कूल से लौटता तो तारा दौड़कर मेरे हाथों से किताबों का बस्ता ले लेती। जब मैं स्कूल जाने के लिए गाड़ी पर बैठतातो वह भी आकर मेरे साथ बैठ जाती। एक दिन उसके सामने चची ने चचाजी से कहा, तारा को मैं अपनी बहू बनाऊँगी। क्यों कृष्णातू तारा से ब्याह करेगा ?’ मैं मारे शर्म के बाहर भाग गयालेकिन तारा वहीं खड़ी रहीमानो चची ने उसे मिठाई देने को बुलाया हो।

उस दिन से चचा और चची में अक्सर यही चर्चा होती ... कभी सलाह के ढंग सेकभी मजाक के ढंग से। उस अवसर पर मैं तो शर्माकर बाहर भाग जाता थापर तारा खुश होती थी। दोनों परिवारों में इतना घराव था कि इस सम्बन्ध का हो जाना कोई असाधारण बात न थी। तारा के माता-पिता को तो इसका पूरा विश्वास था कि तारा से मेरा विवाह होगा। मैं जब उनके घर जाता, तो मेरी बड़ी आवभगत होती। तारा की माँ उसे मेरे साथ छोड़कर किसी बहाने से टल जाती थीं। किसी को अब इसमें शक न था कि तारा ही मेरी ह्रदयेश्वरी
होगी।

एक दिन उस सरला ने मिट्टी का एक घरौंदा बनाया। मेरे मकान के सामने नीम का पेड़ था। उसी की छॉह में वह घरौंदा तैयार हुआ। उसमें कई जरा-जरा से कमरे थेकई मिट्टी के बरतनएक नन्ही-सी चारपाई थी।
मैंने जाकर देखातो तारा घरौंदा बनाने में तन्मय हो रही थी। मुझे देखते ही दौड़कर मेरे पास आयी और बोली, क़ृष्णाचलो हमारा घर देखोमैंने अभी बनाया है। घरौंदा देखातो हँसकर बोला, इसमें कौन रहेगातारा ?’
तारा ने ऐसा मुँह बनायामानो यह व्यर्थ का प्रश्न था ! 
बोली, क्यों,  हम और तुम कहाँ रहेंगे जब हमारा-तुम्हारा विवाह हो जायगातो हम लोग इसी घर में आकर रहेंगे। वह देखोतुम्हारी बैठक हैतुम यहीं बैठकर पढ़ोगे। दूसरा कमरा मेरा हैइसमें बैठकर मैं गुड़िया खेलूँगी।
मैंने हँसी करके कहा, क्योंक्या मैं सारी उम्र पढ़ता ही रहूँगा और तुम हमेशा गुड़िया ही खेलती रहोगी ?’
तारा ने मेरी तरफ इस ढंग से देखाजैसे मेरी बात नहीं समझी। पगली जानती थी कि जिन्दगी खेलने और हँसने ही के लिए है। यह न जानती थी कि एक दिन हवा का एक झोंका आयेगा और इस घरौंदे को उड़ा ले जायेगा और इसी के साथ हम दोनों भी कहीं-से-कहीं जा उड़ेंगे।

इसके बाद मैं पिताजी के पास चला आया और कई साल पढ़ता रहा। लखनऊ की जलवायु मेरे अनुकूल न थीया पिताजी ने मुझे अपने पास रखने के लिए यह बहाना किया थामैं निश्चय नहीं कह सकता। इण्टरमीडिएट तक मैं आगरे ही में पढ़ालेकिन चचा साहब के दर्शनों के लिए बराबर जाता रहता था। हर एक तातील में लखनऊ अवश्य जाता और गर्मियों की छुट्टी तो पूरी लखनऊ ही में कटती थी। एक छुट्टी गुजरते ही दूसरी छुट्टी आने के दिन गिने जाने लगते थे। अगर मुझे एक दिन की भी देर हो जातीतो तारा का पत्र आ पहुँचता। बचपन के उस सरल प्रेम में अब जवानी का उत्साह और उन्माद था। वे प्यारे दिन क्या भूल सकते हैं ! वही मधुर स्मृतियाँ अब इस जीवन का सर्वस्व हैं। हम दोनों रात को सब की नजरें बचाकर मिलते
और हवाई किले बनाते। इससे कोई यह न समझे कि हमारे मन में पाप थाकदापि नहीं। हमारे बीच में एक भी ऐसा शब्दएक भी ऐसा संकेत न आने पाताजो हम दूसरों के सामने न कर सकतेजो उचित सीमा के बाहर होते।  यह केवल वह संकोच थाजो इस अवस्था में हुआ करता है। शादी हो जाने के बाद भी तो कुछ दिनों तक स्त्री और पुरुष बड़ों के सामने बातें करते लजाते हैं। हाँजो अंग्रेजी सभ्यता के उपासक हैंउनकी बात मैं नहीं चलाता। वे तो बड़ों के सामने आलिंगन और चुम्बन तक करते हैं। हमारी मुलाकातें दोस्तों की मुलाकातें होती थीं क़भी ताश की बाजी होतीकभी साहित्य की चर्चाकभी स्वदेश सेवा के मनसूबे बँधतेकभी संसार यात्रा के।

क्या कहूँ, तारा का ह्रदय कितना पवित्र था ! अब मुझे ज्ञात हुआ कि स्त्री कैसे पुरुष पर नियन्त्रण कर सकती हैकुत्सित को कैसे पवित्र बना सकती है। एक-दूसरे से बातें करने मेंएक-दूसरे के सामने बैठे रहने में हमें असीम आनन्द होता था। फिरप्रेम की बातों की जरूर वहाँ होती हैंजहाँ अपने अखण्ड अनुराग, अपनी अतुल निष्ठाअपने पूर्ण आत्म-समर्पण का विश्वास दिलाना होता है। हमारा संबंध तो स्थिर हो चुका था। केवल रस्में बाकी थीं। वह मुझे अपना पति समझती थीमैं उसे अपनी पत्नी समझता था। ठाकुरजी का भोग लगाने
के पहले थाल के पदार्थों में कौन हाथ लगा सकता है हम दोनों में कभी-कभी लड़ाई भी होती थी और कई-कई दिनों तक बातचीत की नौबत न आती; लेकिन ज्यादती कोई करेमनाना उसी को पड़ता था। मैं जरा-सी बात पर तिनक जाता था। वह हँसमुख थीबहुत ही सहनशीललेकिन उसके साथ ही मानिनी भी परले सिरे की। मुझे खिलाकर भी खुद न खातीमुझे हँसाकर भी खुद न हँसती।

इंटरमीडिएट पास होते ही मुझे फौज में एक जगह मिल गयी। उस विभाग के अफसरों में पिताजी का बड़ा मान था। मैं सार्जेन्ट हो गया और सौभाग्य से लखनऊ ही में मेरी नियुक्ति हुई। मुँहमाँगी मुराद पूरी हुई। मगर विधि-वाम कुछ और ही षडयन्त्र रच रहा था। मैं तो इस खयाल में मगन था कि कुछ दिनों में तारा मेरी होगी। उधर एक दूसरा ही गुल खिल गया। शहर के एक नामी रईस ने चचाजी से मेरे विवाह की बात छेड़ दी
और आठ हजार रुपये दहेज का वचन दिया। चचाजी के मुँह से लार टपक पड़ी। सोचायह आशातीत रकम मिलती हैइसे क्यों छोङूँ। विमल बाबू की कन्या का विवाह कहीं-न-कहीं हो ही जायगा। उन्हें सोचकर जवाब देने का वादा करके विदा किया और विमल बाबू को बुलाकर बोले, आज चौधरी साहब कृष्णा की शादी की बातचीत करने आये थे। आप तो उन्हें जानते होंगे ? अच्छे रईस हैं। आठ हजार रुपये दे रहे हैं। मैंने कह दिया हैसोचकर जवाब दूंगा। आपकी क्या राय है यह शादी मंजूर कर लूँ ? विमल बाबू ने चकित होकर कहा, यह आप क्या फरमाते हैं कृष्णा की शादी तो तारा से ठीक हो चुकी है न ?’

चचा साहब ने अनजान बनकर कहा, यह तो मुझे आज मालूम हो रहा है। किसने ठीक की है यह शादी आपसे तो मुझसे इस विषय में कोई भी बातचीत नहीं हुई।
विमल बाबू जरा गर्म होकर बोले, ज़ो बात आज दस-बारह साल से सुनता हूँक्या उसकी तसदीक भी करनी चाहिए थी मैं तो इसे तय समझे बैठा हूँ। मैं ही क्यासारा मुहल्ला तय समझ रहा है।
चचा साहब ने बदनामी के भय से जरा दबकर कहा, भाई साहबहक तो यह है कि मैं जब कभी इस सम्बन्ध की चर्चा करता थादिल्लगी के तौर पर लेकिन खैरमैं आपको निराश नहीं करना चाहता। आप मेरे पुराने
मित्र हैं। मैं आपके साथ सब तरह की रिआयत करने को तैयार हूँ। मुझे आठ हजार मिल रहे हैं। आप मुझे सात ही हजार दीजिए छ: हजार ही दीजिए।
विमल बाबू ने उदासीन भाव से कहा, आप मुझसे मजाक कर रहे हैं या सचमुच दहेज माँग रहे हैंमुझे यकीन नहीं आता।
चचा साहब ने माथा सिकोड़कर कहा, इसमें मजाक की तो कोई बात नहीं। मैं आपके सामने चौधरी से बातें कर सकता हूँ।
विमल बाबू आपने तो यह नया प्रश्न छेड़ दिया। मुझे तो स्वप्न में भी गुमान न था कि हमारे और आपके बीच में यह प्रश्न खड़ा होगा। ईश्वर ने आपको बहुत कुछ दिया है। दस-पाँच हजार में आपका कुछ न बनेगा।
हाँयह रकम मेरी सामर्थ्य से बाहर है। मैं तो आपसे दया ही की भिक्षा माँग सकता हूँ। आज दस-बारह साल से हम कृष्णा को अपना दामाद समझते आ रहे हैं। आपकी बातों से भी कई बार इसकी तसदीक हो चुकी है। कृष्णा और तारा में जो प्रेम हैवह आपसे छिपा नहीं है। ईश्वर के लिए थोड़े-से रुपयों के वास्ते कई जनों का खून न कीजिए।
चचा साहब ने धृष्टता से कहा, विमल बाबूमुझे खेद है कि मैं इस विषय में और नहीं दब सकता।
विमल बाबू जरा तेज होकर बोले, आप मेरा गला घोंट रहे हैं !
चचा –‘आपको मेरा एहसान मानना चाहिए कि कितनी रिआयत कर रहा हूँ।
विमल—‘क्यों न होआप मेरा गला घोंटें और मैं आपका एहसान मानूँ मैं इतना उदार नहीं हूँ। अगर मुझे मालूम होता कि आप इतने लोभी हैंतो आपसे दूर ही रहता। मैं आपको सज्जन समझता था। अब मालूम हुआ कि आप भी कौड़ियों के गुलाम हैं। जिसकी निगाह में मुरौवत नहींजिसकी बातों का कोई विश्वास नहींउसे मैं शरीफ नहीं कह सकता। आपको अख्तियार हैकृष्णा बाबू की शादी जहाँ चाहें करेंलेकिन आपको हाथ न मलना पड़ेतो कहिएगा। तारा का विवाह तो कहीं-न-कहीं हो ही जायगा और ईश्वर ने चाहा तो किसी अच्छे ही घर में होगा। संसार में सज्जनों का अभाव नहीं हैमगर आपके हाथ अपयश के सिवा और कुछ न लगेगा।
चचा साहब ने त्यौरियाँ चढ़ाकर कहा, अगर आप मेरे घर में न होतेतो इस अपमान का कुछ जवाब देता !
विमल बाबू ने छड़ी उठा ली और कमरे से बाहर जाते हुए कहा, आप मुझे क्या जवाब देंगे आप जवाब देने के योग्य ही नहीं हैं।

उसी दिन शाम को जब मैं बैरक से आया और जलपान करके विमल बाबू के घर जाने लगातो चची ने कहा, क़हाँ जाते हो विमल बाबू से और तुम्हारे चचाजी से आज एक झड़प हो गयी।
मैंने ठिठककर ताज्जुब के साथ कहा, झड़प हो गयी ! किस बात पर ?’
चची ने सारा-का-सारा वृत्तान्त कह सुनाया और विमल को जितने काले रंगों में रंग सकींरंगा – ‘तुमसे क्या कहूँ बेटाऐसा मुँहफट तो आदमी ही नहीं देखा। हजारों ही गालियाँ दींलड़ने पर आमादा हो गया।
मैंने एक मिनट तक सन्नाटे में खड़े रहकर कहा, अच्छी बात हैवहाँ  न जाऊँगा। बैरक जा रहा हूँ। चची बहुत रोयीं-चिल्लायींपर मैं एक क्षण-भर भी न ठहरा। ऐसा जान पड़ता थाजैसे कोई मेरे ह्रदय में भाले भोंक रहा है। घर से बैरक तक पैदल जाने में शायद मुझे दस मिनट से ज्यादा न लगे होंगे। बार-बार जी झुँझलाता थाचचा साहब पर नहींविमल बाबू पर भी नहींकेवल अपने ऊपर। क्यों मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि जाकर चचा साहब से कह दूं क़ोई मुझे लाख रुपये भी देतो शादी न करूँगा। मैं क्यों इतना इरपोकइतना तेजहीनइतना दब्बू हो गया ?
इसी क्रोध में मैंने पिताजी को एक पत्र लिखा और वह सारा वृत्तांत सुनाने के बाद अन्त में लिखा मैंने निश्चय कर लिया है कि और कहीं शादी न करूँगाचाहे मुझे आपकी अवज्ञा ही क्यों न करनी पड़े। उस आवेश में
न जाने क्या-क्या लिख गयाअब याद भी नहीं। इतना ही याद है कि दस-बारह पन्ने दस मिनट में लिख डाले थे। सम्भव होता तो मैं यही सारी बातें तार से भेजता।

तीन दिन मैंने बड़ी व्यग्रता के साथ काटे। उसका केवल अनुमान किया जा सकता है। सोचतातारा हमें अपने मन में कितना नीच समझ रही होगी। कई बार जी में आया कि चलकर उसके पैरों पर गिर पङूँ और कहूँ 
‘ देवीमेरा अपराध क्षमा करो चचा साहब के कठोर व्यवहार की परवाह न करो मैं तुम्हारा था और तुम्हारा हूँ। चचा साहब मुझसे बिगड़ जायँपिताजी घर से निकाल देंमुझे किसी की परवा नहीं हैलेकिन तुम्हें खोकर मेरा जीवन ही खो जायगा।
तीसरे दिन पत्र का जवाब आया। रही-सही आशा भी टूट गयी। वही जवाब था जिसकी मुझे शंका थी। लिखा था --‘भाई साहब मेरे पूज्य हैं। उन्होंने जो निश्चय किया हैउसके विरुद्ध मैं एक शब्द भी मुँह से नहीं निकाल सकता और तुम्हारे लिए भी यही उचित है कि उन्हें नाराज न करो।‘ मैंने उस पत्र को फाड़कर पैरों से कुचल दिया और उसी वक्त विमल बाबू के घर की तरफ चला। आह ! उस वक्त अगर कोई मेरा रास्ता रोक
लेतामुझे धमकाता कि उधर मत जाओतो मैं विमल बाबू के पास जाकर ही दम लेता और आज मेरा जीवन कुछ और ही होतापर वहाँ मना करनेवाला कौन बैठा था। कुछ दूर चलकर हिम्मत हार बैठा। लौट पड़ा। कह
नहीं सकताक्या सोचकर लौटा। चचा साहब की अप्रसन्नता का मुझे रत्ती-भर भी भय न था। उनकी अब मेरे दिल में जरा भी इज्जत न थी। मैं उनकी सारी सम्पत्ति को ठुकरा देने को तैयार था। पिताजी के नाराज हो जाने का भी डर न था। संकोच केवल यह था क़ौन मुँह लेकर जाऊँ ! आखिर मैं उन्हीं चचा का भतीजा तो हूँ। विमल बाबू मुझसे मुखातिब न हुए या जाते-ही-जाते दुत्कार दियातो मेरे लिए डूब मरने के सिवा और क्या रह जायगा ?सबसे बड़ी शंका यह थी कि कहीं तारा ही मेरा तिरस्कार कर बैठे तो मेरी क्या गति होगी। हाय ! आँदय तारा ! निष्ठुर तारा ! अबोधा तारा ! अगर तूने उस वक्त दो शब्द लिखकर मुझे तसल्ली दे दी होतीतो आज मेरा जीवन कितना सुखमय होता। तेरे मौन ने मुझे मटियामेट कर दिया सदा के लिए ! आहसदा के लिए।

तीन दिन फिर मैंने अंगारों पर लोट-लोटकर काटे। ठान लिया था कि अब किसी से न मिलूँगा। सारा संसार मुझे अपना शत्रु-सा दीखता था। तारा पर भी क्रोध आता था। चचा साहब की तो सूरत से मुझे घृणा हो गयी थीमगर तीसरे दिन शाम को चचाजी का रुक्का पहुँचामुझसे आकर मिल जाओ। जी में तो आयालिख दूंमेरा आपसे कोई सम्बन्ध नहींआप समझ लीजिएमैं मर गया। मगर फिर उनके स्नेह और उपकारों की याद आ गयी। खरी-खरी सुनाने का भी अच्छा अवसर मिल रहा था। ह्रदय में युद्ध का नशा और जोश भरे हुए मैं चचाजी की सेवा में पहुँच गया। चचाजी ने मुझे सिर से पैर तक देखकर कहा, क्या आजकल तुम्हारी
तबियत अच्छी नहीं है आज रायसाहब सीताराम तशरीफ लाये थे। तुमसे कुछ बातें करना चाहते हैं। कल सबेरे मौका मिलेतो चले आना या तुम्हें लौटने की जल्दी न होतो मैं इसी वक्त बुला भेजूँ। मैं समझ तो गया कि यह रायसाहब कौन हैंलेकिन अनजान बनकर बोला, ‘ यह रायसाहब कौन हैं मेरा तो उनसे परिचय नहीं है।
चचाजी ने लापरवाही से कहा, अजीयह वही महाशय हैंजो तुम्हारे ब्याह के लिए घेरे हुए हैं। शहर के रईस और कुलीन आदमी हैं। लड़की भी बहुत अच्छी है। कम-से-कम तारा से कई गुनी अच्छी। मैंने हाँ कर लिया
है। तुम्हें भी जो बातें पूछनी होंउनसे पूछ लो। 
मैंने आवेश के उमड़ते हुए तूफान को रोककर कहा, आपने नाहक हाँकी। मैं अपना विवाह नहीं करना चाहता।
चचाजी ने मेरी तरफ आँखें फाड़कर कहा, क्यों ?’
मैंने उसी निर्भीकता से जवाब दिया –‘इसीलिए कि मैं इस विषय में स्वाधीन रहना चाहता हूँ।
चचा साहब ने जरा नर्म होकर कहा, मैं अपनी बात दे चुका हूँक्या तुम्हें इसका कुछ खयाल नहीं है ?’
मैंने उद्दण्डता से जवाब दिया। जो बात पैसों पर बिकती हैउसके लिए
  मैं अपनी जिन्दगी नहीं खराब कर सकता।
चचा साहब ने गम्भीर भाव से कहा, यह तुम्हारा आखिरी फैसला है ?’
'जी हाँआखिरी।'
'पछताना पड़ेगा।'
'आप इसकी चिन्ता न करें। आपको कष्ट देने न आऊँगा।'
'अच्छी बात है।'
यह कहकर वह उठे और अन्दर चले गये। मैं कमरे से निकला और बैरक की तरफ चला। सारी पृथ्वी चक्कर खा रही थीआसमान नाच रहा था और मेरी देह हवा में उड़ी जाती थी। मालूम होता थापैरों के नीचे की
जमीन है ही नहीं। बैरक में पहुँचकर मैं पलंग पर लेट गया और फूट-फूटकर रोने लगा। माँ-बापचाचा-चाचीधन-दौलतसबकुछ होते हुए भी मैं अनाथ था। उफ ! कितना निर्दय आघात था !

सबेरे हमारे रेजिमेंट को देहरादून जाने का हुक्म हुआ। मुझे आँखें-सी मिल गयीं। अब लखनऊ काटे खाता था। उसके गली-कूचों तक से घृणा हो गयी थी। एक बार जी में आयाचलकर तारा से मिल लूँमगर फिर वही शंका हुई क़हीं वह मुखातिब न हुई तो विमल बाबू इस दशा में भी मुझसे उतना ही स्नेह दिखायेंगेजितना अब तक दिखाते आये हैंइसका मैं निश्चय न कर सका। पहले मैं एक धानी परिवार का दीपक थाअब एक अनाथ युवकजिसे मजूरी के सिवा और कोई अवलम्ब नहीं था। देहरादून में अगर कुछ दिन मैं शान्ति से रहतातो सम्भव थामेरा आहत ह्रदय सँभल जाता और मैं विमल बाबू को मना लेतालेकिन वहाँ पहुँचे
एक सप्ताह भी न हुआ था कि मुझे तारा का पत्र मिल गया। पते को देखकर मेरे हाथ काँपने लगे। समस्त देह में कंपन-सा होने लगा। शायद शेर को सामने देखकर मैं इतना भयभीत न होता। हिम्मत ही न पड़ती थी कि उसे खोलूँ। वही लिखावट थीवही मोतियों की लड़ीजिसे देखकर मेरे लोचन तृप्त-से हो जाते थेजिसे चूमता था और ह्रदय से लगाता थावही काले अक्षर आज नागिनों से भी ज्यादा डरावने मालूम होते थे। अनुमान कर रहा था कि उसने क्या लिखा होगापर अनुमान की दूर तक दौड़ भी पत्र के विषय तक न पहुँच सकी। आखिरएक बार कलेजा मजबूत करके मैंने पत्र खोल डाला। देखते ही आँखों में अन्धेरा छा गया। मालूम हुआकिसी ने शीशा पिघलाकर पिला दिया। तारा का विवाह तय हो गया था। शादी होने में कुल चौबीस घंटे बाकी थे। उसने मुझसे अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगी थी और विनती की थी कि – मुझे भुला मत देना। पत्र का अंतिम वाक्य पढ़कर मेरी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी। लिखा था यह अंतिम प्यार लो। अब आज से मेरे और तुम्हारे बीच में केवल मैत्री का नाता है। मगर कुछ और समझूँ तो वह अपने पति के साथ अन्याय होगाजिसे शायद तुम सबसे ज्यादा नापसंद करोगे। बस इससे अधिक और न लिखूँगी। बहुत अच्छा हुआ कि
तुम यहाँ से चले गये। तुम यहाँ रहतेतो तुम्हें भी दु:ख होता और मुझे भी। मगर प्यारे ! अपनी इस अभागिनी तारा को भूल न जाना। तुमसे यही अन्तिम निवेदन है।ट

मैं पत्र को हाथ में लिये-लिये लेट गया। मालूम होता थाछाती फट जायगी ! भगवान्अब क्या करूँ जब तक मैं लखनऊ पहुँचूँगाबारात द्वार पर आ चुकी होगीयह निश्चय था। लेकिन तारा के अंतिम दर्शन करने की
प्रबल इच्छा को मैं किसी तरह न रोक सकता था। वही अब जीवन की अंतिम लालसा थी। मैंने जाकर कमांडिंग आफिसर से कहा, मुझे एक बड़े जरूरी काम से लखनऊ जाना है। तीन दिन की छुट्टी चाहता हूँ।
साहब ने कहा, अभी छुट्टी नहीं मिल सकती। 
'मेरा जाना जरूरी है।'
'तुम नहीं जा सकते।'
'मैं किसी तरह नहीं रुक सकता।'
'तुम किसी तरह नहीं जा सकते।'

मैंने और अधिक आग्रह न किया। वहाँ से चला आया। रात की गाड़ी से लखनऊ जाने का निश्चय कर लिया। कोर्ट-मार्शल का अब मुझे जरा भी डर न था। जब मैं लखनऊ पहुँचातो शाम हो गयी थी। कुछ देर तक मैं प्लेटफार्म से दूर खड़ा खूब अन्धेरा हो जाने का इन्तजार करता रहा। तब अपनी किस्मत
के नाटक का सबसे भीषण कांड देखने चला। बारात द्वार पर आ गयी थी। गैस की रोशनी हो रही थी। बाराती लोग जमा थे। हमारे मकान की छत तारा की छत से मिली हुई थी। रास्ता मरदाने कमरे की बगल से था। चचा साहब शायद कहीं सैर करने गये हुए थे। नौकर-चाकर सब बारात की बहार देख रहे थे। मैं चुपके से जीने पर चढ़ा और छत पर जा पहुँचा। वहाँ उस वक्त बिलकुल सन्नाटा था। उसे देखकर मेरा दिल भर आया। हाय ! यही वह स्थान हैजहाँ हमने प्रेम के आनन्द उठाये थे। यहीं मैं तारा के साथ बैठकर जिन्दगी के मनसूबे बाँधता था ! यही स्थान मेरी आशाओं का स्वर्ग और मेरे जीवन का तीर्थ था। इस जमीन का एक-एक अणु मेरे लिए मधुर-स्मृतियों से पवित्र था। पर हाय ! मेरे ह्रदय की भाँति आज वह भी ऊजाड़,सुनसानअन्धेरा था।ल

मैं उसी जमीन से लिपटकर खूब रोयायहाँ तक कि हिचकियाँ बँध गयीं। काश ! उस वक्त तारा वहाँ आ जातीतो मैं उसके चरणों पर सिर रखकर हमेशा के लिए सो जाता ! मुझे ऐसा भासित होता था कि तारा की पवित्र आत्मा मेरी दशा पर रो रही है। आज भी तारा यहाँ जरूर आयी होगी। शायद इसी जमीन पर लिपटकर वह भी रोयी होगी। उस भूमि से उसके सुगन्धित केशों की महक आ रही थी। मैंने जेब से रूमाल निकाला और वहाँ की धूल जमा करने लगा। एक क्षण में मैंने सारी छत साफ कर डाली और अपनी अभिलाषाओं की इस राख को हाथ में लिये घण्टों रोया। यही मेरे प्रेम का पुरस्कार हैयही मेरी उपासना का वरदान हैयही मेरे जीवन की विभूति है। हाय री दुराशा ! नीचे विवाह के संस्कार हो रहे थे। ठीक आधी रात के समय वधू मण्डप के नीचे आयीअब भाँवरें होंगी। मैं छत के किनारे चला आया और वह मर्मान्तक दृश्य देखने लगा। बसयही मालूम हो रहा था कि कोई ह्रदय के टुकड़े किये डालता है। आश्चर्य हैमेरी छाती क्यों न फट गयीमेरी आँखें
क्यों न निकल पड़ीं। वह मण्डप मेरे लिए एक चिता थीजिसमें वह सबकुछ, जिस पर मेरे जीवन का आधार थाजला जा रहा था।

 
भाँवरें समाप्त हो गयीं तो मैं कोठे से उतरा। अब क्या बाकी था ?चिता की राख भी जलमग्न हो चुकी थी। दिल को थामेवेदना से तड़पता हुआजीने के द्वार तक आयामगर द्वार बाहर से बन्द था। अब क्या हो ?
उल्टे पाँव लौटा। अब तारा के आँगन से होकर जाने के सिवा दूसरा रास्ता न था। मैंने सोचाइस जमघट में मुझे कौन पहचानता हैनिकल जाऊँगा। लेकिन ज्योंही आँगन में पहुँचातारा की माताजी की निगाह पड़ गयी। चौंककर बोलीं, क़ौनकृष्णा बाबू तुम कब आये आओमेरे कमरे में आओ। तुम्हारे चचा साहब के भय से हमने तुम्हें न्यौता नहीं भेजा। तारा प्रात:काल विदा हो जायगी। आओउससे मिल लो। दिन-भर से तुम्हारी रट लगा रही है।
यह कहते हुए उन्होंने मेरा बाजू पकड़ लिया और मुझे खींचते हुए अपने कमरे में ले गयीं। फिर पूछा, अपने घर से होते हुए आये हो न ?’
मैंने कहा, मेरा घर यहाँ कहाँ है ?’
'क्योंतुम्हारे चचा साहब नहीं हैं ?'
'हाँचचा साहब का घर हैमेरा घर अब कहीं नहीं है। बनने की कभी आशा थीपर आप लोगों ने वह भी तोड़ दी।'
'हमारा इसमें क्या दोष था भैया लड़की का ब्याह तो कहीं-न-कहीं करना था। तुम्हारे चचाजी ने तो हमें मँझधार में छोड़ दिया था। भगवान् ही ने उबारा। क्या अभी स्टेशन से चले आ रहे हो तब तो अभी कुछ
खाया भी न होगा।'
'हाँथोड़ा-सा जहर लाकर दीजिएयही मेरे लिए सबसे अच्छी दवा है।'
वृद्धा विस्मित होकर मुँह ताकने लगी। मुझे तारा से कितना प्रेम थावह बेचारी क्या जानती थी मैंने उसी विरक्ति के साथ फिर कहा, ज़ब आप लोगों ने मुझे मार डालने ही का निश्चय कर लियातो अब देर क्यों करती हैं आप मेरे साथ यह दगा करेंगी यह मैं न समझता था। खैरजो हुआ,अच्छा ही हुआ। चचा और बाप की आँखों से गिरकर मैं शायद आपकी आँखों में भी न जँचता। बुढ़िया ने मेरी तरफ शिकायत की नजरों से देखकर कहा, तुम हमको इतना स्वार्थी समझते होबेटा।
मैंने जले हुए ह्रदय से कहा, अब तक तो न समझता था लेकिन परिस्थिति ने ऐसा समझने को मजबूर किया। मेरे खून का प्यासा दुश्मन भी मेरे ऊपर इससे घातक वार न कर सकता। मेरा खून आप ही की गरदन
पर होगा।
'तुम्हारे चचाजी ने ही तो इन्कार कर दिया ?'
'आप लोगों ने मुझसे भी कुछ पूछा,, मुझसे भी कुछ कहा,मुझे भी कुछ कहने का अवसर दिया आपने तो ऐसी निगाहें फेरीं जैसे आप दिल से यही चाहती थीं। मगर अब आपसे शिकायत क्यों करूँ तारा खुश रहेमेरे लिए यही बहुत है।'
'तो बेटातुमने भी तो कुछ नहीं लिखाअगर तुम एक पुरजा भी लिख देतेतो हमें तस्कीन हो जाती। हमें क्या मालूम था कि तुम तारा को इतना प्यार करते हो। हमसे जरूर भूल हुईमगर उससे बड़ी भूल तुमसे हुई। अब मुझे मालूम हुआ कि तारा क्यों बराबर डाकिये को पूछती रहती थी। अभी कल वह दिन-भर डाकिये की राह देखती रही। जब तुम्हारा कोई खत नहीं आयातब वह निराश हो गयी। बुला दूं उसे मिलना चाहते हो ?'
मैंने चारपाई से उठकर कहा, नहीं-नहींउसे मत बुलाइए। मैं अब उसे नहीं देख सकता। उसे देखकर मैं न-जाने क्या कर बैठूँ।‘ यह कहता हुआ मैं चल पड़ा। तारा की माँ ने कई बार पुकारा पर मैंने पीछे फिर कर भी न देखा।

यह है मुझ निराश की कहानी। इसे आज दस साल गुजर गये। इन दस सालों में मेरे ऊपर जो कुछ बीतीउसे मैं ही जानता हूँ। कई-कई दिन मुझे निराहार रहना पड़ा है। फौज से तो उसके तीसरे ही दिन निकाल दिया
गया था। अब मारे-मारे फिरने के सिवा मुझे कोई काम नहीं। पहले तो काम मिलता ही नहीं और अगर मिल भी गयातो मैं टिकता नहीं। जिन्दगी पहाड़ हो गयी है। किसी बात की रुचि नहीं रही। आदमी की सूरत से दूर भागता हूँ।  तारा प्रसन्न है। तीन-चार साल हुएएक बार मैं उसके घर गया था। उसके स्वामी ने बहुत आग्रह करके बुलाया था। बहुत कसमें दिलायीं। मजबूर होकर गया। वह कली अब खिलकर फूल हो गयी है। तारा मेरे सामने आयी। उसका पति भी बैठा हुआ था। मैं उसकी तरफ ताक न सका। उसने मेरे पैर खींच लिये। मेरे मुँह से एक शब्द भी न निकला। अगर तारा दुखी होतीकष्ट में होतीफटेहालों में होतीतो मैं उस पर बलि हो जातापर सम्पन्नसरसविकसित तारा मेरी संवेदना के योग्य न थी। मैं इस कुटिल विचार
को न रोक सका क़ितनी निष्ठुरता ! कितनी बेवफाई ! शाम को मैं उदास बैठा वहाँ जाने पर पछता रहा था कि तारा का पति आकर मेरे पास बैठ गया और मुस्कराकर बोला, बाबूजीमुझे यह सुनकर खेद हुआ कि तारा से मेरे विवाह हो जाने का आपको बड़ा सदमा हुआ। तारा-जैसी रमणी शायद देवताओं को भी स्वार्थी बना देतीलेकिन मैं आपसे सच कहता हूँअगर मैं जानता कि आपको उससे इतना प्रेम हैतो मैं हरगिज
आपकी राह का काँटा न बनता। शोक यही है कि मुझे बहुत पीछे मालूम हुआ। तारा मुझसे आपकी प्रेम-कथा कह चुकी है।
मैंने मुस्कराकर कहा, तब तो आपको मेरी सूरत से घृणा होगी।
उसने जोश से कहा, इसके प्रतिकूल मैं आपका आभारी हूँ। प्रेम का ऐसा पवित्रऐसा उज्ज्वल आदर्श आपने उसके सामने रखा। वह आपको अब भी उसी मुहब्बत से याद करती है। शायद कोई दिन ऐसा नहीं जाता कि
आपका जिक्र न करती हो। आपके प्रेम को वह अपनी जिन्दगी की सबसे प्यारी चीज समझती है। आप शायद समझते हों कि उन दिनों को याद करके उसे दु:ख होता होगा। बिल्कुल नहींवही उसके जीवन की सबसे मधुर स्मृतियाँ हैं। वह कहती हैमैंने अपने कृष्णा को तुममें पाया है। मेरे लिए इतना ही काफी है।




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